Wednesday, 16 December 2015



सुनो, एकदम से जुदाई बहुत मुश्किल है
ऐसा करो, कुछ किश्तें तय कर लो।





खनकती हँसी और लरज़ते लम्हों को भूल,
अपनी लकीरों से मुझे कैसे ओझल करोगे, चलो तय कर लो।




मेरे चेहरे का सूनापन जितना तुमसे मिलता हो,
छाँट लो, फिर उसे भरने की तरकीब क्या हो
आओ, तय कर लो।




मेरे बिन तुम और मैं तुम बिन, अच्छे नही लगते।
आओ न, साथ रहने के सलीके तय कर लो।

Sunday, 17 May 2015

अन्दर का मौसन जब ठंडा लगता है, स्नो फ्लेक की तरह गिरती हुई ठण्ड नहीं बल्कि जमी हुईं ठण्ड , एक दुसरे कंधे आपस में छूते हैं फिर भी बीच में पसरी हुई ठण्ड पिघल नहीं पाती तो बाहर निकल के खड़ी हो जाती हूँ. चलती ट्रेन के दरवाज़े पे खडा होना , एक अजीब सी तसल्ली से भर देता है. अन्दर सब कुछ कितना सुकून भरा है, सुकून की कहीं कुछ भी नहीं बदलेगा, आज जो है कल भी बिलकुल इसी शक्लो-सूरत में दिखाई देगा , पूरी दुनिया जैसे एक बंद कमरे में सिमटी हुई, आरामदेह लेकिन बंद , लेकिन बाहर दरवाज़े पे खड़ा होना जीवन जीने जैसा लगता है, सर्द और गर्म के बीच में झूलने जैसा. ट्रेन की गति धीमी होती है अब वो धीरे धीरे सरक रही है, सामने से एक और ट्रेन गुज़रती है, मानो इससे मिलने के लिए ही गति कम की गई हो, सामने तुम दिखते हो, उसी तरह पायदान के ऊपरी हिस्से पे खड़े हुए, तुम उदासीन नज़रों से देखते हो मेरी तरफ , लगता है जैसे सिर्फ तुम्हारी आँखों ने देखा निगाहों ने नहीं, मैं एकटक देखती हूँ तुम्हे, तुम आँखें फेरते हो, हवा में तुम्हारे बाल कोई गीत गुनगुना उठते हैं, अचानक कोई भूली बिसरी याद तुम्हारे माथे उतरती है और तुम पलट कर पहचानी हुई निगाहों से मेरी तरफ देखते हो लेकिन तब तक दोनों ट्रेन्स एक दूसरे को लगभग पार कर चुकती है , मैं परेशान नहीं होती, यही तो ज़िन्दगी है, जब तक पहचाना हम अलग हो चुके होते है, क्या फर्क पड़ता है, फिर मिलेंगे किसी मोड़ पर किसी तिराहे पर, ये पटरियां यूँ ही बिछी रहेंगी और उन पर ये ट्रेन्स भी हमें लिए यूँ ही दौड़ती रहेंगी, फिर जब कभी हम एक दूसरे के सामने से गुजरेंगे तो आँख भर जी लेंगे एक दूसरे को, सब्र है मुझमे बहुत.

Saturday, 2 May 2015








एक किस्सा सुनो, सच कहूँगी तो तुम इसे दिल से लगा बैठोगे इसलिए इसे किस्से की तरह सुनना. ये वो किस्सा है जिसे बस यूँ ही न सुना जा सकता है न सुनाया जा सकता है. इसे तो बस नीम तले बैठ के सुना जा सकता है. कहीं और इसलिए नहीं क्यूंकि अलाव के सामने बैठ कर सुनी हुई कहानियाँ एक अलग रंग के ऐसे छोर तक ले जाती हैं जहाँ से लौटने का रास्ता नज़रों में नहीं आता . सिर्फ नीम तले इसलिए कि जब नीम की ठंडी हवाएं तुम्हारी आँखें मूँदने की कोशिश करें तो नीम पर बैठी हर चिड़िया अपने गीतों से तुम्हे ऐसा करने नहीं देगी और जब तुम अपनी उँगलियाँ होंठों पर रख मुस्कुरा उठोगे तो नीम से धरती तक और धरती से नीम की डालियों तक दौड़ लगाती गिलहरियों की पीठ पर खूबसूरत रेखाएँ खिंच जायेंगी. इसे किसी आम या ख़ास कहानी की तरह न सुन लेना. एक प्रेम कहानी को सुनने के लिए और सुनाने के लिए क्या चाहिए आज तक कोई तय नहीं कर पाया बस इसे जागती आँखों सुनना.


कहते हैं इस किस्से की लड़की को, पिछली हर सदी में जन्मी ऐसी लड़कियों ने जिन्होंने कभी मुहब्बत नहीं की थी और बीते और आने वाले हर समय की ऐसी लड़कियों ने भी जिन्होंने टूट कट मुहब्बत की थी, वरदान दिया था की वो इस धरती पर आने वाली हर लड़की के दिल में थोड़ी सी हमेशा बची रहेगी.



इस कहानी में एक लड़की थी जैसी हर कहानी में होती है. और वो हर कहानी में मिलने वाली लड़की की तरह सुन्दर भी थी लेकिन बस बाकी हर कहानी से इतनी ही मिलती थी वो. एक चुप्पा सी लड़की जो आँखों से भी नहीं बोलती थी . उसकी सदा झुकी रहने वाली आँखों ने जाने कौन सी भाषा में लिखे महाकाव्य समेट रखे थे. रोज़मर्रा के मामलों में ज़िन्दगी को पटरी पर बैठाने  में जुटे लोगों के पास न तो इतनी फुर्सत थी और न ही कुव्वत की आठवें रंग की रौशनाई में डूबे उस प्राणवायु से महाकाव्य में दिलचस्पी लेते. वो लड़की गाने नहीं गाती थी बस उस समन्दर किनारे बैठ बांसुरी जरुर बजाया करती थी जिसके पानी में उसने कभी पैर नहीं डुबोए थे जैसा की उसके देस की बाकी लडकियां किया करती थी.उसकी बांसुरी की मद्धम, कहीं पहुँचने को आतुर आवाज़ किनारे पसरी हुई चट्टानों पर सोती हुई पानी की कुछ छोटी और कुछ बड़ी बूँदें  सुनती और उस आवाज़ को समेट चट्टानों से कूद  दूर-दूर देस पहुँचाने का जिम्मा लिए हुए  समंदर में मिल जाती.  उसके देस की लडकियाँ नज़रों से खो जाने तक की दूर किसी चट्टान पर बैठ कर जब अपने पैरों को लहरों में डुबोती थीं तो छोटी-छोटी मछलियाँ आ कर उनकी पाज़ेबों के घुंघरुओं को हँसा देती.  उस देस की जवान होती लडकियाँ जब एक दुसरे के कानों में फुसफुसा के खिल-खिल खिलखिला रही होतीं तब वो पैर के नाखूनों से मिट्टी कुरेदती जाने क्या और जाने कौन सा रंग तलाशा करती. उसकी सहेलियाँ जब सजने- सँवरने के नुस्खे एक-दूसरे को बताया करती ठीक तभी उसी वक़्त जाने कहाँ से लाल चीटियाँ आ कर उससे चिपट जाती और वो उन्हें मारने में अपने कान कहीं गिरवी रख आती.

         पान की महक को बेहद पसंद करने वाली उस लड़की के गालों को उसके कान में पड़े बड़े-बड़े झुमके अक्सर छेड़ जाते जिन्हें कभी किसी लड़के ने महबूब बन कर छुआ  नहीं था. लड़की उन झुमकों की इस हरकत का अक्स हवा में निहारती और उसकी बाँसुरी के स्वर तेज़ गति से धड़कने लगते. रोज़मर्रा के दिनों  जैसे एक दिन जब लड़की समंदर किनारे बैठी बाँसुरी की तान को लहरों में गूँथने में मगन थी तब , जब दिन ढला नहीं था और न ही ढलने को आतुर था. उस देस ऊंची-ऊंची दीवारें नहीं थीं के उचक कर, टेढ़े-मेढ़े हो कर सूरज को देखना पड़े. कहीं पहुँचने की जल्दी किये बिना  धीमी चाल से चलते हुए हवा भी आते-जाते लोगों को निहार रही थी. तभी हवा के साथ बहुत सारे लोगों ने उसे आते देखा, लगा जैसे सूरज को सर पर रख कर ला रहा हो. लोगों ने आँखों को ऊँगलियों की ओट में कर लिया फिर भी वो उसे पहचान नहीं पाए.
                                                                                          जाने कौन था, जाने कहाँ से आया था, किसी दूर देस का राजकुमार तो बिलकुल भी नहीं लगता था. उसकी पहचान के बारे में इतने कयास लगे की आवाजें थक कर निढाल हो गई. बालों की एक लट उसके माथे झूला करती थी जिसे वो अपनी हंसी से पीछे झटक दिया करता था, जब वो लड़का हँसता था तो उसकी गोल-गोल हँसी सुनने वाले को लट्टू सा नचा दिया करती थी.
                                                                                                                  किसी ने गले के कागा को दो ऊँगलियों से पकड़ दावा किया कि ये लड़का उस जहाज़ से आया है जो नीले-हरे पानी में डूबे पत्थरों के हुजूम से टकरा कर टेढ़ा सा  हो गया है. धीमी आवाज़ में कसमे खाने वालो ने तो यहाँ तक सरगोशियाँ की कि उन्होंने उस जहाज़ के ऊपर छोटे-छोटे सुरमई रंग के परिंदों को चक्कर लगाते देखा है. वो लड़का सुनता, सुनता रहता 


सदियाँ गुज़र चुकीं
और
अभी न जाने कितनी सदियाँ गुज़ारनी हैं,
निहारते हुए
तुम्हारी मुस्कुराती आँखों  को,...
जो झांकती हैं दीवार पर टंगे एक फ्रेम में से,
तुम्हारी कुछ आदतो के साथ
मेरा झगड़ा अब भी वैसा ही है
फिर भी
अपनी हज़ार न- नुकुर के बाद भी
एक हाथ से ज़मीन पोंछ,
दुसरे हाथ से तुम्हारी चप्पलें
वहीँ रख देती हूँ, दरवाज़े के उसी एक कोने में
सच के साथ तालमेल बिठाना सीख लिया है अब
तुम्हारा नहीं होना स्वीकारा है मैंने
बाहों पर तैरती तुम्हारी गुनगुनाहट
और
उँगलियों में उलझी तुम्हारी आदतों के साथ
तुमने अपने वादे नहीं लौटाए
और
मैंने अपनी हथेलियाँ नहीं सिकोड़ी
कहीं कोई सन्नाटा नहीं
कहीं कोई आहट नहीं
कोई शिकायत भी नहीं
लेकिन
तुम ही कहो तो
ऐसे भी भला कोई जाता है बिना बताये!!!

Wednesday, 8 April 2015

अक्सर ही हम अपने आस-पास से खुद को जोड़ कर यादें पैदा कर लेते हैं और ये सब इतने सहज ढंग से होता है की यादों का इक्कट्ठा होना पता भी नहीं चलता. असहज तब लगता है जब किसी जगह, किसी सड़क से कोई याद न जुडी हो. एक शहर पीछे छूट गया कुछ ऐसे ही बिना किसी याद के. किसी जगह दो साल रहना और चलते समय उसकी याद से खाली होना मुझे अचंभित करता है. किसी शहर के एक घर में बिठाये हुए दो साल .... उन दो सालों में काफी कुछ हुआ ,काफी कुछ किया, क्या ये याद है? नहीं, मेरे पास एक भी ऐसी याद नहीं जिसे चुप बैठ कर सोचा जाएइस शहर ने मेरे हाथों में मेरी किताब दी तो लोगों पर भरोसा करने की आदत को छोड़ने की सलाह भी दी, . इस शहर में ज़िन्दगी ने एक नया रंग दिखाया.
                                                     अब  नया शहर नए कायदे क़ानून और इस शहर में अपने लिए थोड़ी सी जगह की जद्दोजहद। दोस्त आलोक ने कहा न्यू लाइफ न्यू चैलेंजेज एन्जॉय ईट। बहुत सुकून देने वाले शब्द थे। जब से ये न्यू लाइफ का चेहरा देखा है तब से हर किसी ने सिर्फ लेक्चर ही दिया है  या ये अहसास कराया है की कुछ भी करके मुझे वापस उसी ज़िन्दगी में लौट जाना चाहिए। सूरज का कोई उत्तराधिकारी नहीं हो सकता ये सच है तो वहीँ ये सच भी है की एक तारा अपनी रौशनी से उम्मीद  की एक किरण तो दिखा ही सकता है। अलोक के शब्दों ने वही काम किया है। बड़े से बंद गेट के एक तरफ खड़े हो कर जाते हुए बेटे को देखने के लिए हिम्मत चाहिए और मुझे नहीं लगता की दुनिया में कोई ऐसी माँ होगी जिसमे ये हिम्मत हो। और जब पता हो की अगले महीने दी गई एक तारीख पर आप सिर्फ  फोन पे बात कर सकते हैं और मुलाक़ात की फिलहाल कोई सूरत नहीं तो आँधियों को उदासीनता के साथ देखना और उनसे गुज़र जाना सहज लगने लगता है. 
                                                                       ज़िन्दगी जब उलटी दिशा की तरफ चल पड़े तो इस बदलाव को सहज रूप से लेने या कहना चाहिए की इन हालात में मुस्कुराने की हिम्मत बच्चों में शायद ज्यादा होती है। उसने मेरे काँधे पे हाथ रख कर कहा रो मत मैं जेल में नहीं हूँ और जो तारीख है उसपे फोन कर लेना, हिम्मत रखो मैं जल्दी ही आऊंगा।शान्ति से आये हुए तूफ़ान बहुत गहरे निशान छोड़ते हैं। नकाबों में पड़ती दरारें," हमने तो पहले ही कहा" था सरीखी मुस्कुराहटें अब हौसले का काम करती हैं।
                                                                  पता नहीं क्या खाया होगा, कैसे खाया होगा, उसकी पसंद का कुछ बना भी होगा या नहीं, रात में ठण्ड तो नहीं लगी होगी, ढेर सारे सवाल हैं और जवाब एक भी नहीं. जानती हूँ सेफ हाथों में है फिर भी सवाल अपनी जगह कायम हैं और मैं जवाब की अधिकारी नहीं. 
                                                                              ईश्वर और दोस्तों ने हाथ थामा हुआ है और उम्मीद पूरी होने की उम्मीद में जिए जा रही हूँ की एक दिन सब ठीक हो जायेगा , उस दिन के इंतज़ार में उम्र और अहसास सब रुके हैं.....
                        सांसें छोटी-छोटी सेवइयों की तरह होती हैं खट से टूटने वाली, घर के बाहर बैठी उस एक सीढ़ी से लेकर उस बंद दरवाज़े तक की एक साँस उधार चाहिए फिर सब ठीक हो जायेगा....
                                                                                 

Tuesday, 10 March 2015


                                    एक कारण दो....




लोगों के सामने हँसते- खिलखिलाते सर दर्द को मुट्ठी में दबा कर बैठी थी, वापस लौटी तो एक लिफाफा इंतज़ार में था. उस लिफाफे के इंतज़ार में मैं सुबह से थी, जानती थी,  इंट्यूशन हो गया था शायद की अच्छी खबर नहीं होगी लेकिन उम्मीद तो कंधे पे सवार रहती है न सो मुस्कुरा के लिफाफा खोला, कारण बताओ नोटिस था. कितने अजीब से होते हैं ये नोटिस, कारण बताओ, मैं अभी तक उन शब्दों में प्यार, अपनापन, हक़ जाने क्या-क्या तलाश रही हूँ लेकिन सब कुछ तो तिर्यक रेखा पे जा बैठा है. ये भी होना ही था.  इतने मसाइल हैं चलो एक और सही.  आंसू और ठहाके दोनों अन्दर की तरफ बहते रहते हैं जब मैं उस कारण बताओ नोटिस का जवाब लिखने की सोचती हूँ, कोई जवाब नहीं सूझता, इस नोटिस भेजने वाले पर मुझे बेहद यकीन है हालाँकि कोई वजह नहीं मेरे पास अपने इस यकीन की और न मैंने कभी परवाह की किसी वजह की. लोगों ने मुझे वजहें दी यकीन न करने की लेकिन तब मैंने बस मुस्कुराना ठीक समझा. हाथों में वो कागज़ ले कर देखती हूँ अजीब सी खुशबु आती है, और मैं हँस पड़ती हूँ खुद के बनाये इस भरम पर जिसे मैं बड़ी शिद्दत से बना के रखती हूँ. जीने के लिए भरम जरुरी होते हैं क्या? मुझे तो भरम हो रखा है जीने का.
                                                                                           क्यूँ नहीं मैं बाकी सबकी तरह हो सकती? अरे एक कारण बताओ नोटिस ही तो है अच्छा सा जवाब ड्राफ्ट करो, भेजो और चैन से सो जाओ. लेकिन ऐसा कर नहीं सकती , ऐसा हो नहीं सकता, एक छोटी सी बात में भी जाने क्या क्या तलाशती रहती हूँ, सब कहते हैं ऐसे मौकों पर फैक्ट्स एंड फिगर्स में बात करनी चाहिए जो मेरे बस का नहीं सो सच -झूठ से परे एक लाइन का जवाब भेज दिया. अब तो जो होगा सुबह ही होगा और इस रात की सुबह कभी तो होगी ही न.

 जिस दिन तुम मेरा दामन छोडो उस दिन इस उम्मीद की उँगली पकड जरुर ही अपने साथ ले जाना.




ईश्वर को भी लास्ट वार्निंग दे दी है सरप्राइज़ पार्टी के लिए....





उसने कहा था जब बिना लाग-लपेट के, बिना शब्दों को घुमाए  बोलती हूँ तो उसे सुनना अच्छा लगता है .............यकीन है मुझे इस बात पर




अब की बार जब दूँगी आवाज़
तो
जरुर ही रख देना कानो में मेरे
किसी अँधेरे कोने में
बचा कर रखा हुआ एक बहाना
नीली पड़ने के बावजूद भी
हिलने की हिम्मत रखने वाली
उँगलियों को बींध देना
ठंडी सवालिया नज़रों से
 नहीं है मेरे पास
एक भी कारण
की
संतुष्ट कर सकू तुम्हे
और बचा ले जाऊं
कुछ जिंदा रह गई चीज़ों के अवशेष,

तुम्हारे पास बचा हो शायद कोई बहाना
दस्तकों को सुनने या  अनसुना करने का
 ,



   

Tuesday, 17 February 2015


                                        इश्क....इश्क.....इश्क....                         







सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।



मधुशाला....मधुशाला... जब भी ये सुनती हूँ अपना पहला इश्क याद आता है. जैसे पहले एक जय साबुन का ऐड आता था  ..पहला प्यार.. लाये जीवन में बहार.. पहला प्यार.. कैसा अजीब सा गुदगुदी सा अहसास होता था टीवी पर ये ऐड देख कर. वैसे ही जब आज ये लाइन्स कानों में पड़ी तो याद आया अपना पहला प्यार. या यूँ कहना चाहिए की मुझे दो बार पहला प्यार हुआ, अब कौन सा पहला कौन सा दूसरा तय करना कठिन तो दोनों ही मेरे पहले प्यार ... शायद सातवीं क्लास में थी जब घर में मधुशाला पहली बार सुनी ... सुनी और डूबती गई... ये वो ज़माना था जब क्लास की लडकियां मिल्स एंड बूंस पढ़ती थी और उन खूबसूरत से ग्रीक देवों जैसे हीरो की चर्चा किया करती थीं. ऐसा नहीं की मैंने पढने की कोशिश नहीं की  लेकिन एक नावेल भी पूरा नहीं पढ़ पाई कभी. जब मधुशाला सुनी तो इन शब्दों के रचयिता के प्रेम में पड़ गई. पता नहीं क्यूँ मन्ना डे से इश्क नहीं हुआ.. इश्क हुआ तो शब्दों से और बेहिसाब हुआ. उसके बाद हरिवंश राय बच्चन को पढ़ा गया. उनकी कविता नीड़ का निर्माण फिर फिर को पढ़ कर जाने कितने इंटर स्कूल चैम्पियनशिप में ट्रॉफी जीती गई. शब्दों की इन गलियों में किसने ऊँगली पकड़ पहली बार सैर कराई थी याद नहीं . पापा के पास बहुत किताबें थी .. इंग्लिश नोवेल्स थे जो नाइन्थ क्लास तक आते आते सारे चाट डाले. इन नोवेल्स के इलावा  विष्णु प्रभाकर, शिवानी,  आशापूर्णा देवी, शरत चन्द्र, राजेंद्र बेदी, इस्मत चुगताई, मंटो,   और भी जाने कितने नाम जो नाइन्थ तक पढ़ डाले. फिर एक दिन किसी ने मेरे हाथों में अमृता प्रीतम की रसीदी टिकट रखी. लगा शब्दों को ऐसे भी संजोया जाता है? मन ऐसे भी कागज़ पर उतारा जाता है? हम किसी को कितना पसंद करते हैं शायद ये इस बात पर निर्भर करता है की हमने उनकी पहली आवाज़ कौन सी सुनी. अब तक शब्दों , भावों  की सीधी-सीधी  गलियों में घूम रही थी अचानक ही  तीखे मोड़ों, सीधी अतल  गहराई और चुभती सी चढ़ाई वाले रस्तों पर किसी ने ला खड़ा किया. यही समय था जब मैंने ग़ुलाम अली की" एक पगली मेरा नाम जो ले , घबराए भी शर्माए भी" और मेहँदी हसन की "मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो" सुनी, लेकिन पता नहीं क्यूँ न तोमुझे मोहसिन नकवी और न ही मसरूर अनवर से मुहब्बत हुई , हुई भी तो इन आवाज़ों के जादूगरों से हुई. ग़ुलाम अली को सुनो तो लगता है की कहीं बहुत बहुत  उतार ले जा रही है ये आवाज़. तो दूसरी तरफ मेहँदी हसन की आवाज़ आसमान के पार नीरवता में भिगो देती है. बेग़म अख्तर से परिचय भी इन्हीं दिनों हुआ था , उनको सुनो तो सीने में हुलक सी उठती थी. गोया ये के इश्क में डूबने को महबूब बेहिसाब थे और हमारे इश्क के चर्चे भी आम थे. अच्छा हुआ कभी किसी चेहरे की लगन में नहीं डूबी, पता नहीं, याद नहीं की कब कैसे रंगों में डूबी, रंग... रंग... उँगलियों से आती रंग की खुशबु.... हथेलियाँ रंगों से सरोबार... चेहरा .. कपड़े सब रंगों में लिपटे हुए... इतनी सी याद बची है की रंगों में डूबना सुकून बनता गया. तारपीन के तेल की महक किसी भी डियो की महक से ज्यादा अच्छी लगने लगी. आज भी जब अपनी दुनिया में पैर फैला के बैठने का मन होता है तो कैनवास और रंगों की ही पनाह में जाती हूँ.
                              जाने रंगों से ज्यादा मोहब्बत है या शब्दों और आवाजों के जादूगरों से ... कभी फैसला नहीं हुआ ... इसलिए दोनों से ही इश्क पहला इश्क हुआ. कौन ज्यादा सर चढ़ के बोलता है .... कौन ज्यादा गहरे तक पैठा हुआ है पता नहीं..
                                                                                    इश्क किया और डूब कर टूट कर किया, इन आवाजों ने , इन शब्दों ने,इन रंगों की खुशबुओं ने   इश्क की गहरी लू में तपती रेत पर तड़पना सिखाया जो आज तक मुसलसल जारी है. किसी चेहरे से शायद ऐसा जुनूनी इश्क नहीं कर पाती जो एक ख्याल से कर बैठी.... जब तक ये इश्क सलामत तब तक हम सलामत..



रोक सको तो पहली बारिश की बूँदों को तुम रोको
कच्ची मिट्टी तो महकेगी है मिट्टी की मजबूरी

Tuesday, 10 February 2015



तुम मेरे लिए ताबीज़ जैसे हो

और

मैं तुम्हारे लिए किसी राह की अजनबी राहगीर

तुम्हे होना ही था

और मैं ठहर कर क्या करती

हज़ार साल भी रहती तो भी

तुम्हारी राह मुझसे से ना मिल पाती
                                                  एक अदद दोस्त चाहिए.....








आज किसी से बात करने का जी चाह रहा है, असल में आज नहीं बल्कि पिछले कई दिनों से मन हो रहा है कोई मिल जाए और मैं अपना जी उड़ेल दूं. लेकिन ऐसा कहाँ हो पता है. जो सोचो वो तो बिलकुल नहीं हो पाता . किसी दोस्त के सामने  बैठ सब कुछ कहना या फिर फोन पे ही दिल खोलना कहाँ हो पता है मुमकिन. दोस्त हैं तो ज़ाहिर सी बात है मेरे दुःख पे दुखी हो जायेंगे, बस यही बात मुझे कुछ भी कहने से रोक लेती है. और देखा जाए तो दुःख भी नहीं है, शायद अपने कम्फर्ट जोंन से बाहर नहीं निकलना चाहती. ऐसे वक़्त में वो मेंढक वाली कहानी याद आ जाती है जो उबलते पानी से चाहना के बावजूद नहीं निकल पाता. कहानी कुछ यूँ है की एक मेंढक को कुछ वैज्ञानिकों ने एक आधे भरे हुए कांच के जार में डाल  दिया. वैज्ञानिकों ने अब पानी का टेम्प्रेचर बढ़ाना शुरू किया, पानी गर्म होता गया और मेंढक अपने आपको उस गर्म होते पानी के साथ एडजस्ट करने में लगा रहा. एक समय ऐसा आया जब उसने निर्णय लिया बाहर कूदने का लेकिन तब तक देर हो गई थी और वो अपनी सारी एनर्जी खर्च कर चूका था अपने आपको एडजस्ट करने में. कहीं ऐसा ही हाल मेरा भी न हो. परिस्थितियों से एडजस्ट करते करते कहीं मैं उस लॉन्च पैड को अनदेखा न कर दूं जो ज़िन्दगी मुझे दे रही है.

                                                                                    ज़िन्दगी बदलने वाली है, पूरी तरह बदलने वाली है, क्या इस बदलाव से भाग रही हूँ, या डर लग रहा है, कहना मुहाल है. क्या वाकई अकेलापन इतना त्रासद होता है की उससे डरा जाए. क्या करुँगी, कैसे रहूंगी जैसे सवाल इस इंतज़ार में मुँह बाए खड़े हैं की मैं उनके जवाब तलाश कर उन्हें दे दूं. लेकिन फिलहाल मेरे पास कोई जवाब नहीं. सिर्फ एक मूल मन्त्र है --"जो होता है अच्छे के लिए होता है", "जो होगा देखा जायेगा". कहना आसान है करना मुश्किल. किसी से मतलब किसी से भी भाई- भाभी माँ पापा कुछ नहीं कहा जा सकता, जब किसी का कोई इख्तियार नहीं तो बोलना क्यूँ. एक दोस्त कहता है की प्रकृति हमें तैयार करती है आने वाली ज़िन्दगी के लिए, शायद यही सच हो.  उससे इधर-उधर की ढेरों बातें की लेकिन चाह  कर भी उसे कुछ नहीं बता पाई. वो पूछता है दिल्ली कब आओगी, और मैं उसे एक महीने का नाम बता देती हूँ ये सोचते हुए की अभी झूठ बोल लो जब वो वक़्त आएगा तब देखा जाएगा.
       

                                                                                                      एक अदद दोस्त चाहिए जैसा विज्ञापन दे देती हूँ, ऐसा दोस्त जो अजनबी भी हो, जिसके आगे जब आँखें भर आये तो वो ना रोये, जिससे कुछ भी कहना और कह कर भूल जाना आसान हो.

एक कागज़ पे ढेर सारे नाम लिखे. उन्हें दोस्तों, रिश्तेदारों, परिचितों जैसी कैटेगिरी में बांटा. फिर पेंसिल चबाते हुए सोचा परिचितों के सामने दिल उड़ेलना जैसी बेवकूफी नहीं करनी चाहिए. रिश्तेदारों और दोस्तों के नाम भी एक एक कर कटते गए, कुछ को मेरी नहीं सुननी और कुछ को मैं अपनी सुना के दुखी नहीं करना चाहती, तो लो बचा  रह गया ख़ाली कागज़ और सारी परेशानियां मेरे पास. फ्यूचर पता नहीं क्या है फिर भी फ्यूचर प्लान कर रही हूँ रात-रात जाग के. खुली आँखों से सपने देखने जैसा मीठा कुछ नहीं होता. जहाँ मैं अपनी ज़िन्दगी रिवाइंड करती हूँ, कुछ पलों को जितनी बार मन करे उतनी बार जीती हूँ, सुखद फ्यूचर निहारती हूँ और एक दिन सब ठीक हो जाएगा कह कर आँखें मूँद सोने की कोशिश करती हूँ.

                                                                               ना पेंटिंग कर रही हूँ , ना लिख रही हूँ और ना ही कुछ पढने में मन लगा पा रही हूँ. स्कूल के  बच्चो,  जिनके एग्जाम सर पे हों, की तरह किताब खोल के गोद में रख लेती हूँ और आँखें पन्नों में बींध देती हूँ फिर भी कुछ नहीं दीखता. अलबत्ता वो सब जरुर याद आता है जो नहीं आना चाहिए. अजीब कैफियत हो चली है.

                                                      मजाज़ के इलावा और कौन  है जो सहारा दे सके

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ 
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ 
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
                                                                               

Thursday, 5 February 2015








                                                            कासनी पाजेब


                                                            ========







सर्दियों की कुनमुनी धूप में जब सोल्या इत्मीनान से छत पर लेटा चेहरे पर किसी ख्वाब की मूरत का पल्लू डाले गुनगुना रहा होता -तुम मेरे पास रहो, मेरे कातिल मेरे दिलदार मेरे पास रहो.....वो धप-धप करती चली आती. पता नहीं उसकी शख्सियत में क्या था की हवा की गुनगुनाहट शोर करने लगती.


" चुप क्यूँ हो गए? अच्छा लगता है तुम्हारी आवाज़ सुनना, तुम्हारी आवाज़ में सुनना.


सोल्या आधी आँखें मीचे उसे देखता रहता, उसके हाथों में किताबें होती. वो तीन घर छोड़ उस परले घर वालों की लड़की थी जो अक्सर उससे पढने चली आती. उसके यूँ चले आने से सोल्या को कभी कोफ़्त नहीं हुई , कोफ़्त होती थी उसके हाथ में किताबों के साथ कासनी रंग के उस अधबुने स्वेटर की ऊन और सलाइयाँ देख कर. हद्द उदास रंग था, जाने उसने यही रंग क्यूँ चुना था. देखने में वो ठीक ही थी, उसके चेहरे का साँवला रंग ऐसा था मानो किसी ने सुरमई फूल से रंग ले चेहरे पर फेर दिया हो, आँखे हलकी सुनहरी दमक लिए हुए ,कमर तक के गहरे काले बाल थोड़ी खुलती हुई सी चोटी में गुंथे रहते, उसके थोड़े से खुले होंठों को देख के हमेशा ही ये लगता की वो कुछ कहने वाली है लेकिन सोच में गुम है. पढ़ाते हुए अक्सर सोल्या उसकी हथेली पर छड़ी से मारा करता. उसके कंधे थोड़े से उचकते, आँखें झुकती लेकिन मुंह से एक आह तक न निकलती. उसकी आह सुनने के लिए अगली बार वह ज़रा ज्यादा जोर से उस प्लास्टिक की पतली लचीली स्टिक को आजमाता. उसकी निगाह ऊपर उठती पल भर को , पता नहीं क्या था उन आँखों में की वो चुप हो जाता, अन्दर-बाहर से एकदम चुप. लगता जैसे अभी-अभी धरती आसमान पर कोई अपने गीले पैरों के निशान छोड़ गया हो. सोल्या अपनी इस अवाक चुप्पी पर खिसिया जाता और वो होंठों के कोनो से "बचपना कब जायेगा तुम्हारा" कहती हुई ऊन सुलझाने लगती.


किसी ऐसे दिन जब सोल्या जंगले में से धूप को विदा कर होता तब वह आती तो वो उसे वहीँ कमरे में बैठने को कहता. उतरती शाम में हल्की पीली रौशनी में उसे पढना अच्छा लगता.


"फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों,


फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों, अफ़साने हों"


धीमी गहरी आवाज़ उसकी जब रूकती तो वह पलंग के अपने लिए तय किये हुए कोने पर बैठते हुए पूछती -" आवाज़ से किसे छूना चाहते हो", उसका पूछना भी उसका कहना लगता.जैसे उसे जवाब की कोई दरकार ही न हो.


सोल्या आवाज़ को थोड़ा तेज़ कर कहता "पढाई में ध्यान लगाना है तो इधर कुर्सी पर बैठो"


इतना सुनते ही वो मुस्कुराते हुए पैर ऊपर कर मोड़ कर बैठ जाती. पलंग पर पड़ी उसकी रजाई खींचती और उसे अपने घुटनों पर डाल लेती. सोल्या के तकिये को सीधा कर उससे कमर टेक देती..


"बडकी भौजी देख रही हो, ऐसे होती है क्या पढाई"


भौजी को कमरे में आया देख वो रजाई से पैर निकाल पलंग से नीचे लटका लेती और अपने अधूरे स्वेटर की सलाइयाँ उठा लेती.भौजी चुप उसके झुके सर को गहरी नज़रों से खड़ी देखती.


"और इसका ये स्वेटर भी ले जाओ , जाने इस जनम में पूरा होगा भी या नहीं"


'उम्मीद है एक दिन हो ही जायेगा पूरा" भौजी गहरी सांस के साथ जवाब देती.


सोल्या अचरज से भर जाता, समझ न पाता की इसमें इतनी उदासी वाली क्या बात है.


* * *










कुरते की बाँह मोड़ते हुए सोल्या सीढ़ियों से उतर रहा था जब उसने बडकी भौजी के साथ पिछले दरवाज़े के पास उसे खड़े देखा. पता नहीं क्या खुसुरफुसुर हो रही थी दोनों में जो उसे देख कर बंद हो गई.


"तुम इस वक़्त यहाँ क्या कर रही हो? आज तो ब्याह है न तुम्हारा?


ह्म्म्म ! उसने बिना सोल्या की तरफ देखे बस इतना कहा.


अरे! गर्मियां शुरू हो गई और तुम्हारा ये स्वेटर हुआ की नहीं पूरा ? हँसते हुए सोल्या ने भौजी के हाथ से स्वेटर लेते हुए कहा.


अभी तक अधूरा है? हैरत से सोल्या ने उसकी तरफ देखा . ना बाहें सिली हो न बगल में ही सिलाई की हो, अब भौजी करेंगी क्या इसे पूरा. अपनी आवाज़ की इस खनक पर सोल्या खुद ही हैरान था.


"हाँ! अब तो भौजी ही करेंगी पूरा, भौजी कर दोगी न इसे पूरा, उसकी आवाज़ में काई जमी थी , सोल्या का मन किया आवाज़ को उठा नीचे झाँक ले बस एक बार.


" इतनी गर्मी में तुम्हारा मनमीत ही पहन सकता है स्वेटर वो भी ऐसे वाहियात रंग का", सोल्या की आवाज़ की आदतन हँसी उदास हो गई थी. उसे कार्ड पर लिखे नाम ज़हन में तैर रहे थे.


"जानती हूँ, मेरा मनमीत ही पहनेगा इसे", इतनी देर में वो पहली बार सोल्या की  आँखों को अपनी निगाहों से बाँध मुस्कुराई, लगा तेज़ आँधी चली , आती हुई शाम दप्प से बुझी, एक ज़लज़ला आया और एक बार फिर कच्चा घड़ा फूट गया.


घड़ी भर के सन्नाटे के बाद सोल्या भौजी को बोल घर से निकल गया , उसकी आवाज़ ने दौड़ते हुए आ कर कहा शाम को वक़्त पर आ जाना. सोल्या के क़दमों ने रुक कर उसे वक़्त पर आ जाने का आश्वासन देना चाहा लेकिन वो सुनी-अनसुनी कर बाहर सड़क पर आ गया. जेबों में हाथ डाल वो घूमता रहा, कई सारे नन्हे पत्थरों को ठोकर मारी, उसे वो सड़क नहीं मिल रही थी जिस पर उसे जाना था, उसने छोटे-छोटे खिलौने बेचते आदमी को देखा, मन किया की उससे हरे रंग का चश्मा खरीद ले. ट्रैफिक का शोर, पैदल चलते लोग सोल्या को हैरानी थी की सबको पता था की उन्हें कहाँ जाना है बस उसे ही कोई ठौर नहीं मिलता . पैरों को घसीटता हुआ सोल्या लाइब्रेरी में जा कर बैठ गया. वो पढ़ रहा था , बेख्याली में गुनगुना रहा था .

"फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी प्रीत हमारी हो

फ़र्ज़ करो इस प्रीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो" गुनगुनाते हुए उसकी निगाह घड़ी की तरफ उठी, उसने अपने माथे पर अक्षत महसूस किया, मंगल गीत की आवाज़ उसे भिगो गई और वहीँ सामने टेबल पर इंशा जी की गोद में सर रखे वो बुदबुदा उठा-" तुम्हे छूना चाहता हूँ"





* * *


अब वो नहीं आती, सोल्या को घर सूना सा लगता , उसे लगता घर की जान किसी एक इंसान में ही होती है, सारी चमक सारी रौनक किसी एक के हवाले से ही होती है, वो इस घर की नहीं थी लेकिन सोल्या को लगता ये घर उसी का है. उसकी दौड़ती आवाज़ रुकी रुकी सी मालूम होती. सोल्या के कमरे की उस खिड़की पर पता नहीं कितनी बार धूप पसरी कितनी बार सिमटी, जाने कैसे तो और कितने तो मौसम आये और गुज़र गए, उसने गिनना छोड़ दिया था. छत को जाती सीढ़ियों पर पाँव के निशान बने अरसा गुज़र चला था. भौजी ने भी हल्दी की गांठों को पानी में भिगो कर सुखाना छोड़ दिया था. उसकी किताबों पर गर्द की मोटी परत बैठी रहती, लिखना-पढना अब उसका छूट चला था. काम से उसे फुर्सत नहीं मिलती जैसी तसल्लियाँ वो खुद को आये दिन देता रहता. कमरे से कुर्सी उसने बाहर कर दी थी. मेज़ को खींच कर उसने पलंग से लगा लिया था अब वो मेज़ पर झुक कर काम करते हुए पलंग पर बैठ पैर मोड़ लेता. इससे उसकी यादों को आराम मिलता.











सोल्या सुरमई चमक वाली एक ही जोड़ी आँखों का स्केच बार- बार बनाता. खूब-खूब सफ़ेद कागज़ पर बनाता जिससे आँखें खूब सफ़ेद और साफ़ उभर कर आयें. सोल्या को कभी अफ़सोस नहीं हुआ की उसने उसके कहने से भी कभी उसका स्केच नहीं बनाया.


"आँखें कभी इतनी सफ़ेद नहीं हुआ करती" सोल्या ने चौंक कर देखा, वो चाय का कप मेज़ पर रख चुकी थी. उसकी शांत आवाज़ ने जाने किससे कही थी ये बात. सोल्या ने एक बार उसे देखा और एक बार अपने बनाये स्केच को. वही चेहरा था, वही रंगत, वही आँखें फिर भी सोल्या को उसे पहचानने में मुश्किल हो रही थी. सोल्या ने सिर्फ सोचा कहा नहीं. वो जाने के लिए पलटी  तो लगा ओस की बूँद चटक कर टूट गई हो.


"सुनो... सोल्या की आवाज़ से ज्यादा हाथो ने पुकारा .


" इतनी सड़ी गर्मी में ये बिना सिला स्वेटर क्यूँ पहन रक्खा है, अब तो इस रंग की ऊन भी नहीं मिलेगी", उसने बिना मुड़े ही कहा.


सोल्या की धुँधली आँखें कुछ जवाब देती उससे पहले ही कासनी पाज़ेबों की आवाज़ सीढियां उतर रही थी.

Sunday, 18 January 2015

नहीं है प्रेम तुमसे
मैं नहीं हूँ तुम्हारे प्रेम में डूबी हुई
हाँ
लेकिन
जब देखती हूँ तुम्हे
तो नज़र में होता है उसका चेहरा
उसकी बातें , उसकी मुस्कान
तुम्हारी किसी बात पर जब खिलखिल कर उठती हूँ
तब वह होती है एक नैराश्य में डूबी खिलखिलाहट
कि
नहीं वो पास की भर सकु रंगों को मुठियों में
नहीं वो पास की डुबो सकूँ सारी उम्र को उसके रंगों में
सच ,नहीं है मुझे प्रेम तुमसे
किसी के कहने से भी नहीं है
बस
तुम्हारे नाम का बीच वाला अक्षर हु ब हु मिलता है उसके नाम के बीच वाले ही अक्षर से
शायद इसलिए थोडा सा लगाव हो उठा है तुमसे
लेकिन प्रेम तो सिर्फ उससे ही है ।

Saturday, 17 January 2015

तुम्हारे चेहरे के साथ कभी मिलना नहीं हुआ तुमसे
फिर भी हर पल जिया है तुम्हारी उपस्तिथि को
तुम्हारे लिए गीत लिखे
पीठ पीछे उँगलियों को उलझा कभी कभी ढोया भी है तुम्हे
कल पढ़ी एक कहानी के हिज्जो में तुम दिखे थे कुछ धुंधले से
तुमसे मिलना तय है एक दिन
जैसे
तय है मिलना मृत्यु से


अक्सर बहुत कुछ भूलने लगी हूँ मैं अब,




भूल जाती हूँ तुम्हारे खतों को वापस वापस पढ़ना




बैठी रहती हूँ इंतज़ार में धैर्य से भरकर




घुटने और ठुड्डी जोड़ कमर मोड़ लगा लेती हूँ दीवार से




पैरों में होती झुनझुनी के बीच भूल जाती हूँ बैठी रही उम्र को उठाना अक्सर ,


देखती हूँ गोदी में पड़े निढाल से कुहनियों तक जमे तुम्हारे भीगे स्पर्श को,

अब अक्सर आसान लगता है
गीले , जमे, सूखे , पिघले, कैसे भी निशान को भूल जाना

इसी तरह कदम ब कदम चलते हुए एक दिन भूल जाउंगी वापस लौटना
.........................उम्मीद है।

Thursday, 15 January 2015






मुझे ख़त लिखने नहीं आते और ना ही आता है शिकायतें करना, आता है तो बस हर पल , हर क्षण तुम्हे जीना. प्रतीक्षा में आसान लगता है तुम्हे गढ़ लेना, बिना देखे तुम्हे महसूस करना . इससे ज्यादा की न जरुरत है और न ही इच्छा.




भीगी आँखों और हँसती आवाज़ के बीच, दोनों हथेलियों की लकीरों को जोड़ते ,बीते समय को होंठों के किनारे पे अटका, जब तुमने कहा की आज बेहद खुश हो तुम तो सच जानो इससे ज्यादा सुकून देने वाले शब्द इस और उस दोनों ही दुनिया में न हैं और न ही हो सकते हैं।

बिल्कुल भी अजीब नहीं लगता की तुमसे बात करते हुए याद करती हूँ तुम्हे बेतरह.










तुम्हारे लिए ऐसा कोई शब्द गढ़ ही नहीं पाई आज तक जो मेरी सोच, मेरे मन, को परिभाषित कर सके.













तुम्हारे सामने बैठ देखना तुम्हें वो सब पढ़ते हुए जो मैंने तुम्हारे लिए लिखा ।

तुम्हारा मुस्कुराना और कहना "कविताएं समझ नहीं आती मुझे"।

लेकिन तुम्हारी आँखें ,तुम्हारा स्पर्श ,कह उठता है की तुम मेरे शब्दों को नहीं सिर्फ और सिर्फ मुझे पढ़ना चाहते हो।

तुम्हारे सामने बैठ के उन शब्दों को मुट्ठियों में भरना जो कभी लिख नहीं पाउंगी।

कलाई में बंधे काले धागे के नीचे एक उंगली डाल तुमने खींचा था और मेरी मुट्ठी खुल गई थी, खुली हथेली पे जोर से हाथ मार तुमने वो सारे बीज उड़ा दिए थे जो अब लौट कर तुम्हारी जेबों में बैठ जाते हैं और तुम मुट्ठियाँ भींच लेते हो।

तुमने कहा- जाओ , तुम्हारी आँखों ने कहा-मत सुनो मेरी । कैसा वरदान है न हमारी मुहब्बत को की जब-जब भी कोई आधा अक्षर लिखने को नज़र झुकाएगा हम जी जायेंगे. आओ इस श्राप को साझी ओक से पी लें।

7 जनवरी 2015 का एक लम्हा , जिसे वहीँ रोक दिया है , जिसे न बीतने देना चाहती हूँ और ना महसूस करना और न ही जीना।
रीत गया तो?













दम घुट रहा है, सांस लेने में तकलीफ हो रही है। नहीं, इसमें तुम्हारी याद का कोई कुसूर नहीं.
पिघलती पुतलियों के सारे रंग सूख चले हैं । उंगलियां जिस तरह तुम्हे उकेरना चाहती हैं रंगों को वो मंज़ूर नहीं और रंगों की चाहत को उँगलियों ने नकार दिया है। तुमसे न कोई वादा कभी लिया और न ही दिया फिर भी हमने होंठों पे आये हर आँसू और आँखों में आये हर शब्द को निभाया । शायद नहीं यकीनन मैं आज तक उस लम्हे को जी रही हूँ जिसमे ताकत है की वो मुझे एक साथ ख़ुशी और दुःख दोनों से नवाज़ सके।

Friday, 2 January 2015






तुमने कहा था..आवाज़ दोगी, तारीख़ भी मुकर्रर की थी,




तुमने कहा था

अपनी किसी चाहना की उलझन में

दो उँगलियों में से चुनो ज़रा किसी एक को




तुमने कहा था

जब चुप से कमरे में तैरे आवाज़ कोई

तो

आँखें मूँद,

एक जुम्बिश भर मुस्कुरा दूँ







तुमने कहा था

जब गिनना हों अकेली बैठी सदियों को

तो

मुट्ठी की पीठ पर नहीं

गिना करूँ खतों को










तुमने कहा था....




अब कभी कुछ क्यूँ नहीं कहती तुम।












मेरे तुम्हारे बीच
रहस्य सी
तो कभी
खिलखिलाती सी
मुस्कराहट की वजह
एक शब्द या नाम नहीं
इक दुआ थी
जिसे पढ़ा मैंने और फूंक तुमने मारी थी
अब इसे
तुम्हारे गले से उतार
मैंने बाँधा है उस सूनी बाँह पर
जहाँ कोई भी
नमकीन या मीठे से
टीसते बोसे का
निशान नहीं।