Sunday, 20 July 2014

गढ़ लेना यथार्थ
सपनो की दुनिया में,

रख आना एक दिया
जलने की प्रतीक्षा में
सच और ख्वाब की मुडती सी गली में,

स्मृतियों को गलबहियां डाल
मनुहार करना न लौटने की,

देखना मुस्कुराहटों का
टूट-टूट कर आना,

लफ़्ज़ों के साए पकड़ना
खुलती मुट्ठियों से,

उसके खामोश होने से पहले तुम्हे होना चाहिए था.

Sunday, 13 July 2014

मिले थे कुछ जवाब
अर्थहीन शब्दों की आड़
लिए हुए,

ढूंढें न मिला
एक भी सिरा
उँगलियों पर गिने जा सकने
वाले सवालों का,...

इन सवालों के बीच ही
छुपी थी कहीं
एक शिकायत
मुझे कुतरती हुई सी,

दिख जाए तो बेहद ख़ास
नज़र चूक जाये तो
न जानी न कही

मुझे तो सिर्फ अपनी दूरी का अंदाजा लेना था की कहाँ से दीवार पर मारी हुई गेंद वापस आती है-----मेरी मुठ्ठियों में

Saturday, 12 July 2014

                                सीली लकड़ियों का धुआँ

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                                 पार्ट-1

 वो कल रात ही यहाँ आई थी अपने पति और बच्चो के साथ, पहाड़ों से उतर मैदानी इलाके में जाने के लिए. कुछ घंटों का सफ़र तय कर चुकी थी और आगे के सफ़र के लिए उसे यहाँ से ट्रेन में बैठना था. कल रात ही वो यहाँ पहुंची थी, पहुंचते ही उसने मोमोज़ का डिब्बा निकाल कर बाहर रक्खा, उसे डर था कहीं मोमोज़ खराब न हो जाए. किसी एक आबो-हवा की चीज़ दूसरी जगह जाकर कितने वक़्त जिंदा रह पाएगी जैसे सवाल उसे हैरान करने के लिए आजकल  काफी होते, वो अपनी तईं कोशिश कर रही थी इन छोटे-छोटे सवालों में खुद को उलझा लेने की. पांच महीनो से वो एक फोन कॉल, एक चिट्ठी का इंतज़ार कर रही थी, कल दिन भर में  उसका फोन कई बार बजा था , हर बार नंबर एक ही था, वो पहचानती नहीं थी उस नंबर को फिर भी उसे पता था की वो जानती है की कौन उसे बार-बार फोन कर रहा है , पिछले  पांच महीनो में अपनी आँखों को सूखा रखने में वो अपनी सारी  हिम्मत खर्च कर चुकी थी अब उसमे हिम्मत नहीं थी फोन उठाने की. जब उसके पति ने कई बार कहा की वो फोन उठाती क्यूँ नहीं तो उसने फोन साइलेंट पर कर दिया. रात भर उसे खटका लगा रहा कि कहीं फोन तो नहीं बज रहा, अजीब सी कैफियत तारी रही उस पर. जिस बात के होने का इंतज़ार उसने हमेशा किया वो तो हुई नहीं अलबत्ता उसी बात के रस्ते से गुज़र दूसरी बात हुआ  होना चाहती है और वो उसे मंज़ूर या नामंज़ूर करने की हालत में भी नहीं.


                                                                           ***
अल्ह सुबह  उसने बाहर निकलने के लिए  कमरे का दरवाज़ा खोला, अभी उसके दोनों हाथों ने उन किवाड़ों को छोड़ा भी नहीं था जिन्होंने उसे अन्दर छुपने का रास्ता दिया था कि फिर से हाथों ने उन किवाड़ो पर अपनी पकड़ मज़बूत कर ली, सामने नजारा ही कुछ ऐसा था, कमरे के दरवाज़े के बाहर एक पतला सा गलियारा था जो इस लाइन में बने हर कमरे के सामने से गुज़रता था, गलियारे से लगी हुई दीवार की मुंडेर पर एक काली-भूरी चिड़िया बैठी थी. उसके दरवाज़ा खोलते ही  चिड़िया चिहुंक कर उड़ी और जोर की आवाज़ निकालते  हुए उसके पास से उड़ कर ऊपर आसमान में खो गई.चिड़िया की बोली से बनी खबर सुन  वो हदस गई, उसकी नज़रों ने भी हिम्मत नहीं की उस पंछी का पीछा करने की, उसके पैर जवाब दे गए और वो वहीँ देहरी पर बैठ गई. इतनी पास से देखना इस काली-भूरी चिड़िया को,हे! भगवन अब क्या अनहोनी होनी बची है , उसने जल्दी-जल्दी दुर्गा चालीसा की जितनी भी पंक्तियाँ याद थी पढ़ डाली,  इस  चिड़िया का नाम उसे कभी भी पता नहीं था न ही उसने कभी पता करने की जरुरत समझी. वो अन्धविश्वासी कतई नहीं है, पढ़ी-लिखी समझदार है, समाज में रुतबा है, पति बच्चो को सवांरती आई है इतने सालो से, इस चिड़िया को देखना एक विश्वास है जो उसके अन्दर बचपन से पला है, जब उसे ये चिड़िया जोड़े में दिखती है तो उसके अन्दर झरना फूट पड़ता है कि आज जरूर कुछ अच्छा होना है या कोई अच्छी खबर मिलनी है, और जब यही चिड़िया अपने जोड़े से अलग अकेली दिखे तो उसका मन बैठ-बैठ जाता है कुछ बुरा होने की आशंका से. आज क्या अनहोनी होनी थी, चिड़िया की लाइ खबर हमेशा पूरी होती है बस उसकी तैयारी अधूरी रह जाती है हमेशा ही. इंतज़ार की वो चिट्ठी तो आई नहीं जिस पर बीते दिनों की गर्माहट होती उल्टा ईश्वर उसे चेता जरुर गया था आने वाले धक्के से.हाँ! वो इसे ईश्वर की भेजी  चिट्ठी की ही तरह देखती थी, उसके इस विश्वास ने उससे कभी विश्वासघात न किया था.

                                                                                                                 उसके पति ने झुंझलाते हुए कहा -"चलो भई जल्दी करो , सामान निकालो , बच्चे तैयार हो गए ? निगाहें शर्ट स्लीव के बटन पर जमी हुई, उसके पति को जब तक हाथ पकड़ कर ना दिखाया जाए उन्हें कुछ नहीं दिखता, उसके दूध-केसर सी रंगत वाले चेहरे पर जब उनका ध्यान नहीं जाता तो पसीना-पसीना ज़र्द चेहरे पर क्या जाता.

                                                                                                        उसने बच्चो को नरमी से पुकार सामान बाहर करने और चलने के लिए कहा, उसने बच्चो को निहारा वो फूल-फूल उठती, एक ही पल में औरत से सिर्फ  माँ हो उठती, उसके बच्चे जो किसी भी गहरे से गहरे घाव पर मरहम हो सकने लायक थे, अब तो दोनों  बेटे अपने पिता से ऊँचे निकल रहे थे. उसने अपने पति को देखा वो औरत से बीवी भी होना चाहती थी उसने एक नीम सी  मुस्कराहट से इस ख्याल को झिड़क दिया और पूरी की पूरी एक दुनियादार औरत हो गई.

                                                                           ****
कुनमुनाती धूप वाले दिनों के वो कुछ आखिरी बचे हुए दिन थे, उन्ही दिनों में से किसी एक दिन उसे चिट्ठी मिली थी जिसमे सिर्फ इतना ही लिखा था
"मैं आ रहा हूँ , तीन दिन रुकुंगा "
उन तीन दिनों की तारीख  भी लिखी थी, कोई नाम नहीं था न ही उसे नाम की दरकार थी, इस लिखावट को वो बंद आँख भी पहचान सकती थी, लफ़्ज़ों में भी गंध होती है और ये लफ्ज़ तो खुशबुओं का वो जंगल ले आये थे जिसमे वो डूबती उतराती रही थी. लिफाफा हाथ में ले वो सन्न बैठी रह गई थी, उसे पता नहीं था कब आया ये लिफाफा, नौकरानी ने करीने से सारी चिट्ठियों के साथ इसे भी मेज़ के बीच में रख दिया था, उसकी पढने की मेज़-कुर्सी खिड़की से थोडा हट के कमरे के एक कोने में थी, गर्दन को थोडा बाईं ओर घुमाते ही वो खिड़की से बाहर सड़क देख सकती थी, रात में इसी खिड़की से उसे जुगनू दिखते और बागीचे में लगे फूलों और स्ट्रॉबेरी की महक अन्दर आती, दिन में वो देवदार के ऊंचे-ऊंचे पेड़ो को निहारती. एक बार इन्ही ऊंचे पेड़ो पर उसके बेटे का हैलीकॉप्टर अटक गया था, इन नन्हे बेशकीमती पलों को उसने इसी खिड़की पर संजोया था लेकिन आज उसे कुछ नज़र नहीं आ रहा था, आज इस लम्हा वो सुन्न सी कुर्सी पर बैठी थी, उसकी सारी इन्द्रियाँ आँख बन उन चंद हर्फों को देख रही थी, उसने फोन का रिसीवर उठाया और कान से लगा कर बैठी रही, नहीं आज नहीं उन तारीखों वाले दिन ही फोन करेगी. इस ख़त को देख कितने सारे ठन्डे-गर्म ख्याल आये-गए बस एक ख्याल रुका रहा कि वेद ने उसका पता अभी तक संभाल कर रखा है, उसे लगा वो गुनगुने से पानी में डूब रही है, साँसों के तार जब कसने लगे तो वो चिहुंक कर खड़ी हो गई, कुर्सी गिरने की आवाज़ से नौकरानी दौड़ी आई, नौकरानी क्या कह रही थी उसे कुछ सुनाई नहीं दिया, उस दिन घर में चलते हुए वो दो बार दीवारों से टकरा गई, उसकी आँखें उन तारीखों के साथ लिफाफे में बंद थी. उसने गले में पड़े दुपट्टे के बाएँ कोने में एक गिरह लगाईं और दाएं कोने से एक गाँठ खोल दी.
                           इस बरस उसकी शादी को अट्ठारह साल हो जायेंगे, सब कहते हैं ये साल ख़ास है अब उसे भी लगता है ख़ास है ये साल.
                                                                         (  आगे की कहानी अगले कुछ दिनों में ---)           

Monday, 7 July 2014

रख छोड़े हैं कुछ अनखुले से शब्द
बंद मुट्ठी में,
आँखें बंद करू तो
फूंक मार
इन्द्रधनुष फैला दो हथेलियों पर,





लेकिन तुम भी क्या करोगे ------ तुम तुम हो।
भाग्य के हिस्से
एक सुकून भरी सांस
जो
ली जा सके
खिल-खिल करती हंसी के साथ आँगन में बैठ,
एक लहलहाता हुआ गीत
जो लिखा जा सके
सौंधी महक पर

प्रेम के हिस्से
मैं

जानां
तुमने क्या चुना